Dr. Jaikishan Suthar Cardiac Surgeon · Bikaner

विचार

Perspectives on Health, Society & Public Life

स्वास्थ्य, समाज और सार्वजनिक जीवन

एक डॉक्टर जो रोज़ मरीज़ों से मिलता है, उसे यह दिखता है कि बीमारी कहाँ से आती है। अक्सर किसी वायरस या जीन से नहीं — बल्कि उन परिस्थितियों से जो लोगों को बीमार होने पर मजबूर करती हैं, और बीमार होने के बाद इलाज तक नहीं पहुँचने देतीं। इन विषयों पर चुप रहना संभव नहीं।

छह विषय

जिन पर विचार साझा किए जाते हैं

प्रत्येक विषय पर लेख यहाँ प्रकाशित होते हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था

Healthcare Systems

राजस्थान के जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाइयाँ नहीं पहुँचतीं। और तृतीयक अस्पताल केवल बड़े शहरों म…

ग्रामीण स्वास्थ्य

Rural Health

ग्रामीण स्वास्थ्य की सबसे बड़ी समस्या दवाइयाँ नहीं, डॉक्टर हैं — या उनकी अनुपस्थिति। एमबीबीएस के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में पोस्टिंग को दंड की तरह देखा जाता है।…

युवा एवं खेल

Youth & Sport

बीकानेर और आसपास के क्षेत्रों में प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ी हैं जिन्हें सही मंच नहीं मिला। खेल केवल मनोरंजन नहीं है — यह स्वास्थ्य का निवेश है, युवाओं की ऊर्जा क…

शिक्षा एवं जागरूकता

Education & Awareness

स्वास्थ्य शिक्षा भारत के स्कूल पाठ्यक्रम में नाममात्र की है। बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि उच्च रक्तचाप क्या होता है, हृदयाघात के संकेत कैसे पहचानें, या तंबा…

बीकानेर और राजस्थान

Bikaner & Rajasthan

बीकानेर एक बड़ा शहर है — लेकिन इसकी क्षमता और इसकी उपेक्षा दोनों बड़ी हैं। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, भौगोलिक रूप से महत्त्वपूर्ण, लेकिन बुनियादी ढाँचे में वर्षो…

सार्वजनिक जीवन

Public Life

सार्वजनिक जीवन में आना एक जिम्मेदारी है, अवसर नहीं। जो लोग समाज के सामने खड़े होकर काम करते हैं — डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर — उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ अपने पेशे तक…

लेख

Articles & Reflections

नए लेख सबसे ऊपर प्रकाशित होते हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था · 1 जुलाई 2026

तीन घंटे की दूरी: एक नीतिगत विफलता

जब कोई मरीज़ हृदयाघात के तीन घंटे बाद अस्पताल पहुँचता है, तो हम उसे बचाने की पूरी कोशिश करते हैं। लेकिन असली सवाल यह है — वह तीन घंटे क्यों लगे?

बीकानेर ज़िले के एक गाँव से हमारे अस्पताल तक की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। सड़क ठीक हो तो डेढ़ घंटा। सड़क खराब हो, रात हो, या गाड़ी न मिले — तो तीन घंटे।

हृदयाघात में पहले 90 मिनट सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं। इस खिड़की में अगर इलाज मिले, तो हृदय की स्थायी क्षति रोकी जा सकती है। लेकिन जब वह खिड़की बंद होने के बाद मरीज़ पहुँचता है, तो हम जो कर सकते हैं वह सीमित हो जाता है।

यह एक डॉक्टर की विफलता नहीं है। यह एक व्यवस्था की विफलता है।

ज़िला स्तर पर कार्डियक केयर यूनिट क्यों नहीं हो सकती? प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक प्रशिक्षित चिकित्सक क्यों नहीं हो सकता जो ईसीजी पढ़ सके और तत्काल रेफर कर सके? ये सवाल तकनीकी नहीं हैं — ये नीतिगत हैं। और इनका जवाब नीति-निर्माताओं से माँगा जाना चाहिए।

बीकानेर और राजस्थान · 15 जून 2026

बीकानेर जैसा बड़ा शहर, इतनी छोटी आवाज़ क्यों?

राजस्थान का पाँचवाँ बड़ा शहर। ऊँट महोत्सव की अंतर्राष्ट्रीय पहचान। और एक ऐसा मेडिकल कॉलेज जिसे दशकों से अपग्रेड का इंतज़ार है।

बीकानेर के बारे में बात करते हुए अक्सर पर्यटन की बात होती है — हवेलियाँ, रसगुल्ले, ऊँट। लेकिन जब स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे की बात आती है, तो बीकानेर पीछे छूट जाता है।

पिछले कई वर्षों में बीकानेर ने देखा है कि अच्छे डॉक्टर शहर छोड़ देते हैं, युवा बेहतर अवसरों के लिए जयपुर या दिल्ली चले जाते हैं, और स्थानीय समस्याओं पर ध्यान तब जाता है जब कोई चुनाव करीब हो।

इसके पीछे एक बड़ी वजह है — राजनीतिक प्रतिनिधित्व जो ज़मीनी ज़रूरतों से कटा हुआ हो। जो नीतियाँ बनाता है वह अगर यहाँ की असलियत नहीं जानता, तो नीतियाँ यहाँ के काम नहीं आती।

बीकानेर को ऐसे लोग चाहिए जो यहाँ रहें, यहाँ के लोगों की परेशानियाँ खुद देखें, और उसी आधार पर आवाज़ उठाएँ। यह माँग है — जो हर नागरिक को करनी चाहिए।

सार्वजनिक जीवन · 20 मई 2026

डॉक्टर की ज़िम्मेदारी कहाँ खत्म होती है?

मरीज़ को ठीक कर देना काफी नहीं है, अगर वह उसी माहौल में वापस जाएगा जिसने उसे बीमार किया।

एक मरीज़ आया — 52 वर्ष, किसान, तीसरी बार हृदयाघात। हमने उसे बचाया। लेकिन जब मैंने पूछा कि पिछले दो बार के बाद क्या बदला, तो जवाब मिला — कुछ नहीं। दवाइयाँ मिलती नहीं थीं। पास में डॉक्टर नहीं था। खान-पान वैसा ही रहा क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था।

उस दिन मैंने सोचा — मेरी ज़िम्मेदारी क्या है? सिर्फ उस एक आदमी की, या उस पूरे समुदाय की जो उसी स्थिति में है?

एक डॉक्टर के रूप में मैं एक समय में एक ज़िंदगी बचा सकता हूँ। लेकिन एक नागरिक के रूप में — और अगर संभव हो तो, एक ज़िम्मेदार सार्वजनिक प्रतिनिधि के रूप में — मैं उन परिस्थितियों को बदलने में हिस्सेदारी ले सकता हूँ जो हज़ारों लोगों को उस स्थिति में पहुँचाती हैं।

यह सार्वजनिक जीवन में आने का तर्क है — पद का नहीं, ज़िम्मेदारी का।

ग्रामीण स्वास्थ्य · 2 जुलाई 2026

वो डॉक्टर जो कभी नहीं आया

राजस्थान के गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं — इमारतें हैं, बोर्ड हैं, रजिस्टर हैं। बस डॉक्टर नहीं है।

एक शिविर में गई जब एक बुज़ुर्ग महिला से पूछा कि आप डॉक्टर के पास कब गई थीं आखिरी बार। उन्होंने सोचा, फिर बोलीं: "बेटी की शादी से पहले। वो बारह साल पहले की बात है।"

यह लापरवाही नहीं थी। यह व्यवस्था थी। उनके गाँव का PHC छह किलोमीटर दूर था। वहाँ डॉक्टर हफ्ते में दो दिन आता था — और आता भी था तो दोपहर तक वापस चला जाता था। खेत में काम करने वाली महिला उस समय तक वहाँ कैसे पहुँचती?

"PHC की इमारत बन जाती है। दवाइयाँ आ जाती हैं। लेकिन डॉक्टर नहीं आता — क्योंकि सरकारी पोस्टिंग को दंड की तरह देखा जाता है।"

राजस्थान में MBBS डॉक्टरों की ग्रामीण सेवा अनिवार्य है — एक वर्ष। लेकिन इस एक साल को ज़्यादातर युवा डॉक्टर "सहना" मानते हैं, "करना" नहीं। वजह सिर्फ पैसा नहीं है — बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं, आवास नहीं है, इंटरनेट नहीं है, उपकरण नहीं हैं। एक डॉक्टर को क्यों वहाँ जाना चाहिए जहाँ वह कुछ कर ही न सके?

इसका जवाब नीति में है। ग्रामीण पोस्टिंग को करियर में फायदे वाला बनाना होगा — PG admission में वरीयता, salary supplement, accommodation guarantee। जब तक ऐसा नहीं होता, शिविर लगते रहेंगे — और PHC खाली रहेंगे।

मैं शिविर लगाता हूँ — यह ज़रूरी है। लेकिन शिविर उस खालीपन को नहीं भर सकते जो एक स्थायी डॉक्टर की जगह है। वह काम किसी नीति-निर्माता को करना होगा।

सार्वजनिक जीवन · 18 जून 2026

मरीज़ होना सीखना पड़ता है

भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ बीमारी को नहीं, मरीज़ को भी थका देती है।

एक मरीज़ आए — 45 साल के, किसी दूसरे शहर से। उन्होंने तीन अलग-अलग अस्पतालों में जाँच करवाई थी। हर जगह अलग रिपोर्ट, अलग सलाह। एक ने कहा: ऑपरेशन ज़रूरी है। दूसरे ने कहा: अभी नहीं। तीसरे ने कुछ नहीं बताया — बस जाँचें लिख दीं।

वह मेरे पास चौथी बार आए थे। थके हुए, भ्रमित, डरे हुए। उनकी पत्नी ने पूछा: "साहब, सच क्या है?"

"डॉक्टर बताता तो है — पर मरीज़ जो सुनता है, वह अलग होता है। यह संवाद की खाई है। और इसे पाटना हमारी ज़िम्मेदारी है।"

हमारी व्यवस्था में मरीज़ को "patient" रहने की ट्रेनिंग दी जाती है — चुप रहो, जो कहा जाए मानो, सवाल मत पूछो। डॉक्टर के पास समय नहीं है — अगले पचास मरीज़ बाहर बैठे हैं।

लेकिन जब मरीज़ समझदार होता है — अपनी रिपोर्ट पढ़ता है, सवाल पूछता है, दूसरी राय लेता है — तो नतीजे बेहतर होते हैं। क्योंकि तब वह इलाज का हिस्सा होता है, सिर्फ उसकी वस्तु नहीं।

यह बदलाव दोनों तरफ से होना चाहिए। डॉक्टरों को बेहतर संवाद करना सीखना होगा। और मरीज़ों को यह समझाना होगा कि सवाल पूछना गुस्ताखी नहीं — यह उनका हक है।

स्वास्थ्य व्यवस्था तब बेहतर होती है जब मरीज़ सशक्त होता है। यह काम अस्पतालों में होता है — और उन नीतियों में भी, जो यह तय करती हैं कि डॉक्टर के पास मरीज़ से बात करने के लिए कितना समय है।

Coming Soon

आगामी लेख

युवा एवं खेल · Youth & Sport

बीकानेर के खिलाड़ी और उनका भविष्य

शीघ्र प्रकाशित…

शिक्षा एवं जागरूकता · Education

स्वास्थ्य शिक्षा: जो पाठ्यक्रम में नहीं है

शीघ्र प्रकाशित…

ग्रामीण स्वास्थ्य · Rural Health

वह डॉक्टर जो कभी नहीं आया

शीघ्र प्रकाशित…

ऑपरेशन थियेटर के बाहर से

कुछ बातें जो
मैंने मरीज़ों से सीखीं

ये वो पल हैं जो मुझे याद दिलाते हैं कि यह सिर्फ पेशा नहीं है।

एक रात की बात

"डॉक्टर साहब, दर्द कब तक रहेगा?"

एक बुज़ुर्ग मरीज़ ने पूछा — सर्जरी के अगले दिन। मैंने बताया: दो-तीन हफ्ते। उन्होंने राहत की साँस ली और कहा: "बस? मैं तो सोच रहा था बाकी ज़िंदगी ऐसे ही रहेगी।" उस दिन समझा — मरीज़ के सबसे बड़े डर अक्सर वो होते हैं जो वे पूछते नहीं।

एक शिविर में

जब एक किसान ने कहा: "पहले धान की फसल देख लें, फिर आएंगे"

उसकी रिपोर्ट में गंभीर समस्या थी। हमने समझाया — यह इंतज़ार नहीं करना चाहिए। उसने सुना, सोचा, फिर कहा: "ठीक है। पर फसल कटने दें — घर में और कोई नहीं है।" कभी-कभी मरीज़ की तकलीफ से बड़ी उसकी ज़िम्मेदारी होती है। इसे समझना भी इलाज का हिस्सा है।

एक बच्चे के बाद

जब ऑपरेशन के बाद नौ महीने के बच्चे ने पहली बार मुस्कुराया

ऑपरेशन लंबा था। जब वार्ड में गया, माँ बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। बच्चे ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराया। कोई नहीं जानता कि वह मुझे पहचान रहा था या नहीं। लेकिन उस एक पल ने थकान की भरपाई कर दी। यही वजह है कि अगले दिन फिर OT में जाता हूँ।

एक पुराना सबक

"मेरे पास पैसे नहीं हैं" — तीन शब्द जो डॉक्टर को सुनने चाहिए

Medical school में यह नहीं सिखाते कि जब कोई मरीज़ यह कहे — तो आगे क्या करें। पहले कुछ साल मैं भी नहीं जानता था। फिर धीरे-धीरे समझा: इन तीन शब्दों के बाद रुकना नहीं है — रास्ता निकालना है। हमेशा नहीं हो पाता। लेकिन जब होता है — वह दिन याद रहता है।

किसी कार्यक्रम या व्याख्यान के लिए आमंत्रित करना चाहते हैं?

संपर्क करें
ऐप की तरह इंस्टॉल करें होम स्क्रीन पर जोड़ें — तेज़ और ऑफ़लाइन भी